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जय सनातन

by हिन्दू परिवार संघटन संस्था

      जय सनातन धर्म
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�""देवताओं के वाहन ""�

�अक्सर आपने नास्तिकों और मुस्लिमों को �हिन्दु देवी देवताओं �के वाहनों के बारे में अपशब्द कहते सुना होगा आज आपको बता रहवी हूॅ ��हिन्दु देवी देवताओं ��के वाहनों का क्या रहस्य है?

��⛺हिन्दु देवी देवताओं ⛺�का �पुराणों मे जो वर्णन है उसके अनुसार� देवी देवताओं �के पास ऐसी शक्तीयाॅ हैं जिससे वो पलक झपकते ही सम्पुर्ण ब्रह्मांड में कहीं भी जा सकते थे तो फिर उन्हें पशु पक्षियों को वाहन बनाने की क्या आवश्यकता थी?......

�असलियत में �देवी देवताओं �के साथ जो उनके वाहनों के चित्र होते हैं वो उन� देवताओं �की विशेषताओं के प्रतीक हैं इसलिऐ चित्रकार �देवी देवताओं �के साथ उनके वाहनों के तौर पर उनके चित्र अंकित करते हैं.........

�क्या आप जानते हैं किस� देवता �का वाहन कौन है और क्यों?

���हिंदू धर्म ��में विभिन्न� देवताओं का स्वरूप अलग-अलग बताया गया है। हर देवता का स्वरूप उनके आचरण व व्यवहार के अनुरूप ही हमारे� धर्म ग्रंथों में वर्णित है। स्वरूप के साथ ही �देवताओं के वाहनों में विभिन्नता देखने को मिलती है। �धर्म ग्रंथों के अनुसार अधिकांश देवताओं के वाहन पशु ही होते हैं। �देवताओं �के वाहन के रूप में ये पशु किसी न किस रूप में हमें लाइफ मैनेजमेंट का पाठ भी पढ़ाते हैं। आप भी जानिए किस देवता का वाहन क्या है और क्यों है-

��भगवान श्रीगणेश का वाहन मूषक��

��भगवान श्रीगणेश �का वाहन है�मूषक अर्थात चूहा। �चूहे की विशेषता यह है कि यह हर वस्तु को कुतर डालता है। वह यह नही देखता की वस्तु आवश्यक है या अनावश्यक, कीमती है अथवा बेशकिमती। इसी प्रकार कुतर्की भी यह विचार नही करते की यह कार्य शुभ है अथवा अशुभ। अच्छा है या बुरा। वह हर काम में कुतर्कों द्वारा व्यवधान उत्पन्न करते हैं।�� श्रीगणेश बुद्धि ��एवं ज्ञान हैं तथा कुतर्क मूषक है। जिसको �गणेशजी �ने अपने नीचे दबा कर अपनी सवारी बना रखा है। यह हमारे लिए भी शिक्षा है कि कुतर्कों को परे कर उनका दमन कर ज्ञान को अपनाएं।

���भगवान शंकर का वाहन बैल���

��धर्म ग्रंथों में ���भगवान शंकर�� का वाहन �बैल बताया गया है। �बैल बहुत ही मेहनती जीव होता हैं। वह शक्तिशाली होने के बावजूद शांत एवं भोला होता है। वैसे ही ���भगवान शिव ���भी परमयोगी एवं तप के बल पर शक्तिशाली होते हुए भी परम शांत एवं इतने भोले हैं कि उनका एक नाम ही भोलेनाथ जगत में प्रसिद्ध है। ���भगवान शंकर�� ने जिस तरह काम को भस्म कर उस पर विजय प्राप्त कि थी उसी तरह उनका वाहन भी कामी नही होता। उसका काम पर पूरा नियंत्रण होता है।

���देवी का वाहन शेर���

��शास्त्रों में �देवी �का वाहन �सिंह यानी �शेर बताया गया है। शेर एक संयुक्त परिवार में रहने वाला प्राणी होता हैं। वह अपने परिवार की रक्षा करने के साथ ही सामाजिक रूप से वन में रहता है। वह वन का सबसे शक्तिशाली प्राणी होता है किंतु अपनी शक्ति को व्यर्थ में व्यय नही करता, आवश्यकता पडऩे पर ही उसका उपयोग करता हैं। यह संदेश �देवी �के इस वाहन से मिलता है कि घर की मुखिया स्त्री को अपने परिवार को जोड़कर रखना चाहिए तथा व्यर्थ के कार्यों में अपनी बुद्धि को नही लगाकर घर को सुखी बनाने के लिए ही लगातार प्रयास करना चाहिए।

��लक्ष्मी� का वाहन� हाथी एवं �उल्लू

��माता लक्ष्मी �का वाहन सफेद रंग का हाथी होता है। हाथी भी एक परिवार के साथ मिल-जुलकर रहने वाला सामाजिक एवं बुद्धिमान प्राणी होता हैं। उनके परिवार में मादाओं को प्राथमिकता दी जाती हैं तथा उनका सम्मान किया जाता हैं। �हाथी हिंसक प्राणी नही होता। उसी तरह अपने परिवार वालों को एकता के साथ रखने वाला तथा अपने घर की स्त्रियों को आदर एवं सम्मान देने वालों के साथ �लक्ष्मी� का निवास होता है।
�लक्ष्मी �का वाहन �उल्लू भी होता हैं। ऊल्लू सदा क्रियाशील होता हैं। वह अपना पेट भरने के लिए लगातार कर्मशील होता है। अपने कार्य को पूरी तन्मयता के साथ पूरा करता हैं। इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति रात-दिन मेहनत करता है, �लक्ष्मी �सदा उस पर प्रसन्न होती है तथा स्थाई रूप से उसके घर में निवास करती है।

���सरस्वती �का वाहन हंस��

��मां सरस्वती �का वाहन हंस है। हंस का एक गुण होता है कि उसके सामने दूध एवं पानी मिलाकर रख दें तो वह केवल दूध पी लेता हैं तथा पानी को छोड़ देता है। यानी वह सिर्फ गुण ग्रहण करता है व अवगुण छोड़ देता है। देवी �सरस्वती विद्या की देवी हैं। गुण व अवगुण को पहचानना तभी संभव है जब आपमें ज्ञान हो। इसलिए माता� सरस्वती �का वाहन हंस है।

��हनुमानजी��का आसन �पिशाच�

���हनुमानजी ��प्रेत या� पिशाच को अपना आसन बनाकर उस पर बैठते हैं। इसी को वह अपने वाहन के रूप में भी प्रयोग करते हैं। �पिशाच या प्रेत बुराई तथा दूसरों का भय एवं कष्ट देने वाले होते हैं। इसका अर्थ है कि हमें कभी भी बुराई को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए।

���सूर्य का वाहन रथ���

���भगवान सूर्य ��का वाहन रथ है। इस रथ में सात घोड़ें होते हैं। जो सातों वारों का प्रतीक हैं। रथ का एक पहिया एक वर्ष का प्रतीक है जिसमें बाहर आरे होते हैं तथा छ: ऋतु रूपी छ: नेमीयां होती हैं। ��भगवान सूर्य ��का वाहन रथ इस बात का प्रतीक होता है कि हमें सदैव क्रियाशील रहना चाहिए तभी जीवन में प्रकाश आता है।

��यमराज का वाहन भैंसा��

�यमराज� भैंसे को अपने वाहन के रूप में प्रयोग करते हैं। �भैसा भी सामाजिक प्राणी होता हैं। वह सब मिलकर एक दूसरे की रक्षा करते हैं। एकता द्वारा अपनी एवं अपने परिवार के रक्षक होते हैं। उनका रूप भयानक होता हैं। अत: �यमराज उसको अपने वाहन के तौर पर प्रयोग करते हैं।

��भगवान कार्तिकेय ��का वाहन मोर�

���भगवान शिव ��के पुत्र �कार्तिकेय देवताओं के सेनापति कहे जाते हैं। इनका वाहन मोर है। �धर्म ग्रंथों के अनुसार कार्तिकेय ने �असुरों से युद्ध कर देवताओं को विजय दिलाई थी। अर्थात इनका युद्ध कौशल सबसे श्रेष्ठ हैं। अब यदि इनके वाहन मोर को देखें तो पता चलता है कि इसका मुख्य भोजन �सांप है। �सांप भी बहुत खतरनाक प्राणी है इसलिए इसका शिकार करने के लिए बहुत ही स्फूर्ति और चतुराई की आवश्यकता होती है। इसी गुण के कारण मोर सेनापति �कार्तिकेय �का वाहन है।

���गंगा का वाहन मगर���

��धर्म ग्रंथों में �माता गंगा �का वाहन �मगरमच्छ बताया गया है। इससे अभिप्राय है कि हमें जल में रहने वाले हर प्राणी की रक्षा करनी चाहिए। अपने निजी स्वार्थ के लिए इनका शिकार करना उचित नहीं है क्योंकि जल में रहने वाला हर प्राणी पारिस्थितिक तंत्र में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इनकी अनुपस्थिति में पारिस्थितिक तंत्र बिगड़ सकता है।

���नाग���

�मिथक �साहित्य में �सर्प अनेक तत्त्वों का प्रतिनिधित्व करता है। मणि से सुसज्जित होने के कारण वह धन का प्रतीक है। 'जहां �सर्प कुण्डली मारकर बैठा हो, वहां �पृथ्वी में धन गड़ा है'- ऐसा माना जाता है। �सर्प की टेढ़ी-तिरछी चाल उसे राजनीतिक निपुणता का प्रतीक भी बना देती है- किंतु सर्वाधिक मान्य रूप 'काल' के प्रतीक में मिलता है। �सर्प की गति जल, स्थल, वायु सभी स्थानों में है। उड़नेवाले �सर्प, �पृथ्वी में बिल बनाकर रहनेवाले �सर्प तथा जल में निवास करनेवाले �नाग इस बात के प्रतीक हैं कि 'काल' सर्वव्यापी है। जगत की उत्पत्ति से पूर्व केवल जल में �नाग शेष था- इसी से ��शेषनाग�� कहा गया। उसकी कुण्डली की शय्या पर�� विष्णु ��ने निवास किया तथा उसके एक सहस्त्र फन �विष्णु के मस्तक पर छत्र की भांति विद्यमान थे। इस चित्र के माध्यम से स्पष्ट हुआ कि राजनीतिक निपुणता पर आसीन �विष्णु �'काल-रक्षित' थे, अर्थात उसको घेरकर काल शत्रुओं से उन्हें पूर्ण सुरक्षा प्रदान कर रहा था।

जय सनातन धर्म �������������� �""देवताओं के वाहन ""� �अक्सर आपने नास्तिकों और मुस्लिमों को �हिन्दु देवी देवताओं �के वाहनों के बारे में अपशब्द कहते सुना होगा आज आपको बता रहवी हूॅ ��हिन्दु देवी देवताओं ��के वाहनों का क्या रहस्य है? ��⛺हिन्दु देवी देवताओं ⛺�का �पुराणों मे जो वर्णन है उसके अनुसार� देवी देवताओं �के पास ऐसी शक्तीयाॅ हैं जिससे वो पलक झपकते ही सम्पुर्ण ब्रह्मांड में कहीं भी जा सकते थे तो फिर उन्हें पशु पक्षियों को वाहन बनाने की क्या आवश्यकता थी?...... �असलियत में �देवी देवताओं �के साथ जो उनके वाहनों के चित्र होते हैं वो उन� देवताओं �की विशेषताओं के प्रतीक हैं इसलिऐ चित्रकार �देवी देवताओं �के साथ उनके वाहनों के तौर पर उनके चित्र अंकित करते हैं......... �क्या आप जानते हैं किस� देवता �का वाहन कौन है और क्यों? ���हिंदू धर्म ��में विभिन्न� देवताओं का स्वरूप अलग-अलग बताया गया है। हर देवता का स्वरूप उनके आचरण व व्यवहार के अनुरूप ही हमारे� धर्म ग्रंथों में वर्णित है। स्वरूप के साथ ही �देवताओं के वाहनों में विभिन्नता देखने को मिलती है। �धर्म ग्रंथों के अनुसार अधिकांश देवताओं के वाहन पशु ही होते हैं। �देवताओं �के वाहन के रूप में ये पशु किसी न किस रूप में हमें लाइफ मैनेजमेंट का पाठ भी पढ़ाते हैं। आप भी जानिए किस देवता का वाहन क्या है और क्यों है- ��भगवान श्रीगणेश का वाहन मूषक�� ��भगवान श्रीगणेश �का वाहन है�मूषक अर्थात चूहा। �चूहे की विशेषता यह है कि यह हर वस्तु को कुतर डालता है। वह यह नही देखता की वस्तु आवश्यक है या अनावश्यक, कीमती है अथवा बेशकिमती। इसी प्रकार कुतर्की भी यह विचार नही करते की यह कार्य शुभ है अथवा अशुभ। अच्छा है या बुरा। वह हर काम में कुतर्कों द्वारा व्यवधान उत्पन्न करते हैं।�� श्रीगणेश बुद्धि ��एवं ज्ञान हैं तथा कुतर्क मूषक है। जिसको �गणेशजी �ने अपने नीचे दबा कर अपनी सवारी बना रखा है। यह हमारे लिए भी शिक्षा है कि कुतर्कों को परे कर उनका दमन कर ज्ञान को अपनाएं। ���भगवान शंकर का वाहन बैल��� ��धर्म ग्रंथों में ���भगवान शंकर�� का वाहन �बैल बताया गया है। �बैल बहुत ही मेहनती जीव होता हैं। वह शक्तिशाली होने के बावजूद शांत एवं भोला होता है। वैसे ही ���भगवान शिव ���भी परमयोगी एवं तप के बल पर शक्तिशाली होते हुए भी परम शांत एवं इतने भोले हैं कि उनका एक नाम ही भोलेनाथ जगत में प्रसिद्ध है। ���भगवान शंकर�� ने जिस तरह काम को भस्म कर उस पर विजय प्राप्त कि थी उसी तरह उनका वाहन भी कामी नही होता। उसका काम पर पूरा नियंत्रण होता है। ���देवी का वाहन शेर��� ��शास्त्रों में �देवी �का वाहन �सिंह यानी �शेर बताया गया है। शेर एक संयुक्त परिवार में रहने वाला प्राणी होता हैं। वह अपने परिवार की रक्षा करने के साथ ही सामाजिक रूप से वन में रहता है। वह वन का सबसे शक्तिशाली प्राणी होता है किंतु अपनी शक्ति को व्यर्थ में व्यय नही करता, आवश्यकता पडऩे पर ही उसका उपयोग करता हैं। यह संदेश �देवी �के इस वाहन से मिलता है कि घर की मुखिया स्त्री को अपने परिवार को जोड़कर रखना चाहिए तथा व्यर्थ के कार्यों में अपनी बुद्धि को नही लगाकर घर को सुखी बनाने के लिए ही लगातार प्रयास करना चाहिए। ��लक्ष्मी� का वाहन� हाथी एवं �उल्लू ��माता लक्ष्मी �का वाहन सफेद रंग का हाथी होता है। हाथी भी एक परिवार के साथ मिल-जुलकर रहने वाला सामाजिक एवं बुद्धिमान प्राणी होता हैं। उनके परिवार में मादाओं को प्राथमिकता दी जाती हैं तथा उनका सम्मान किया जाता हैं। �हाथी हिंसक प्राणी नही होता। उसी तरह अपने परिवार वालों को एकता के साथ रखने वाला तथा अपने घर की स्त्रियों को आदर एवं सम्मान देने वालों के साथ �लक्ष्मी� का निवास होता है। �लक्ष्मी �का वाहन �उल्लू भी होता हैं। ऊल्लू सदा क्रियाशील होता हैं। वह अपना पेट भरने के लिए लगातार कर्मशील होता है। अपने कार्य को पूरी तन्मयता के साथ पूरा करता हैं। इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति रात-दिन मेहनत करता है, �लक्ष्मी �सदा उस पर प्रसन्न होती है तथा स्थाई रूप से उसके घर में निवास करती है। ���सरस्वती �का वाहन हंस�� ��मां सरस्वती �का वाहन हंस है। हंस का एक गुण होता है कि उसके सामने दूध एवं पानी मिलाकर रख दें तो वह केवल दूध पी लेता हैं तथा पानी को छोड़ देता है। यानी वह सिर्फ गुण ग्रहण करता है व अवगुण छोड़ देता है। देवी �सरस्वती विद्या की देवी हैं। गुण व अवगुण को पहचानना तभी संभव है जब आपमें ज्ञान हो। इसलिए माता� सरस्वती �का वाहन हंस है। ��हनुमानजी��का आसन �पिशाच� ���हनुमानजी ��प्रेत या� पिशाच को अपना आसन बनाकर उस पर बैठते हैं। इसी को वह अपने वाहन के रूप में भी प्रयोग करते हैं। �पिशाच या प्रेत बुराई तथा दूसरों का भय एवं कष्ट देने वाले होते हैं। इसका अर्थ है कि हमें कभी भी बुराई को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए। ���सूर्य का वाहन रथ��� ���भगवान सूर्य ��का वाहन रथ है। इस रथ में सात घोड़ें होते हैं। जो सातों वारों का प्रतीक हैं। रथ का एक पहिया एक वर्ष का प्रतीक है जिसमें बाहर आरे होते हैं तथा छ: ऋतु रूपी छ: नेमीयां होती हैं। ��भगवान सूर्य ��का वाहन रथ इस बात का प्रतीक होता है कि हमें सदैव क्रियाशील रहना चाहिए तभी जीवन में प्रकाश आता है। ��यमराज का वाहन भैंसा�� �यमराज� भैंसे को अपने वाहन के रूप में प्रयोग करते हैं। �भैसा भी सामाजिक प्राणी होता हैं। वह सब मिलकर एक दूसरे की रक्षा करते हैं। एकता द्वारा अपनी एवं अपने परिवार के रक्षक होते हैं। उनका रूप भयानक होता हैं। अत: �यमराज उसको अपने वाहन के तौर पर प्रयोग करते हैं। ��भगवान कार्तिकेय ��का वाहन मोर� ���भगवान शिव ��के पुत्र �कार्तिकेय देवताओं के सेनापति कहे जाते हैं। इनका वाहन मोर है। �धर्म ग्रंथों के अनुसार कार्तिकेय ने �असुरों से युद्ध कर देवताओं को विजय दिलाई थी। अर्थात इनका युद्ध कौशल सबसे श्रेष्ठ हैं। अब यदि इनके वाहन मोर को देखें तो पता चलता है कि इसका मुख्य भोजन �सांप है। �सांप भी बहुत खतरनाक प्राणी है इसलिए इसका शिकार करने के लिए बहुत ही स्फूर्ति और चतुराई की आवश्यकता होती है। इसी गुण के कारण मोर सेनापति �कार्तिकेय �का वाहन है। ���गंगा का वाहन मगर��� ��धर्म ग्रंथों में �माता गंगा �का वाहन �मगरमच्छ बताया गया है। इससे अभिप्राय है कि हमें जल में रहने वाले हर प्राणी की रक्षा करनी चाहिए। अपने निजी स्वार्थ के लिए इनका शिकार करना उचित नहीं है क्योंकि जल में रहने वाला हर प्राणी पारिस्थितिक तंत्र में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इनकी अनुपस्थिति में पारिस्थितिक तंत्र बिगड़ सकता है। ���नाग��� �मिथक �साहित्य में �सर्प अनेक तत्त्वों का प्रतिनिधित्व करता है। मणि से सुसज्जित होने के कारण वह धन का प्रतीक है। 'जहां �सर्प कुण्डली मारकर बैठा हो, वहां �पृथ्वी में धन गड़ा है'- ऐसा माना जाता है। �सर्प की टेढ़ी-तिरछी चाल उसे राजनीतिक निपुणता का प्रतीक भी बना देती है- किंतु सर्वाधिक मान्य रूप 'काल' के प्रतीक में मिलता है। �सर्प की गति जल, स्थल, वायु सभी स्थानों में है। उड़नेवाले �सर्प, �पृथ्वी में बिल बनाकर रहनेवाले �सर्प तथा जल में निवास करनेवाले �नाग इस बात के प्रतीक हैं कि 'काल' सर्वव्यापी है। जगत की उत्पत्ति से पूर्व केवल जल में �नाग शेष था- इसी से ��शेषनाग�� कहा गया। उसकी कुण्डली की शय्या पर�� विष्णु ��ने निवास किया तथा उसके एक सहस्त्र फन �विष्णु के मस्तक पर छत्र की भांति विद्यमान थे। इस चित्र के माध्यम से स्पष्ट हुआ कि राजनीतिक निपुणता पर आसीन �विष्णु �'काल-रक्षित' थे, अर्थात उसको घेरकर काल शत्रुओं से उन्हें पूर्ण सुरक्षा प्रदान कर रहा था।

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