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गंगा सिर्फ एक नदी का नाम नहीं

by hinduparivar.org

गंगा सिर्फ एक नदी का नाम नहीं है, बल्कि यह जीवनदायी है। गंगा की लहरों ने न जाने कितनी सभ्यताओं व संस्कृतियों को बनते बिगड़ते देखा। वैदिक काल से लेकर आधुनिक युग तक के उत्थान-पतन का गवाह है गंगा। राजनीति, अर्थनीति, सामाजिक व्यवस्था से लेकर धर्म, अध्यात्म, पर्यटन, पर्यावरण तक सब इससे प्रभावित होते रहे हैं। एक ही गंगा के न जाने कितने रूप हैं, हर कोई उसे अपने-अपने नजरिए से विश्लेषित करता है। इसके तट पर विकसित धार्मिक स्थल और तीर्थ भारतीय सामाजिक व्यवस्था के विशेष अंग हैं। इसके ऊपर बने पुल, बाँध और नदी परियोजनाएँ भारत की बिजली, पानी और कृषि से संबंधित जरूरतों को पूरा करती हैं। राष्ट्रीय नदी गंगा भारत की सबसे लंबी नदी है जो पर्वतों, घाटियों और मैदानों में 2,510 किलोमीटर की दूरी तय करती है। वैज्ञानिक मानते हैं कि इस नदी के जल में बैक्टीरियोफेज नामक विषाणु होते हैं, जो जीवाणुओं व अन्य हानिकारक सूक्ष्मजीवों को जीवित नहीं रहने देते हैं। तभी तो इसे माँ कहा गया है। इसकी गोद में न जाने कितनों का विकास हुआ, प्रभाव बढ़ा और आज भी गंगा तट के बाशिंदों को गर्व है कि वे माँ गंगा के सानिध्य में फलते-फूलते हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने गंगा को भुक्ति-मुक्ति दायिनी कहा है। गंगा जी के बारे में तुलसीदास की चौपाई हैः- दरश्, परस, मज्जन अरु पाना। हरहिं पाप, कह वेद पुराना।। अर्थात, गंगा जी के दर्शन, स्पर्श, स्नान और पान से सभी प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं। वैसे भी, गंगा को शास्त्रों में ब्रह्म द्रव कहा गया है। सीधे शब्दों में कहें तो गंगा हमारी जरूरतों को भी पूरा करती हैं और मुक्ति भी दिलाती है। यानी हमारी भुक्ति-मुक्ति दोनों का साधन बनती है।
गंगा नदी हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। यह करोड़ों लोगों के लिए जीवन रेखा और आस्था का प्रतीक है। गंगा नदी के अवतरण को लेकर अनेक पौराणिक कथाएँ जुड़ी हुई हैं। मिथकों के अनुसार ब्रह्म ने विष्णु के पैर के पसीने की बूँदों से गंगा का निर्माण किया। त्रिमूर्ति के दो सदस्यों के स्पर्श के कारण इसे पवित्र समझा गया। एक अन्य कथा राजा भगीरथ से जुड़ी हुई है। इसके अनुसार राजा सगर ने जादुई रुप से साठ हजार पुत्रों की प्राप्ति की। एक दिन राजा सगर ने देवलोक पर विजय प्राप्त करने के लिये एक यज्ञ किया। यज्ञ के लिये घोड़ा आवश्यक था जो ईष्यालु इंद्र ने चुरा लिया था। सगर ने अपने सारे पुत्रों को घोड़े की खोज में भेज दिया। अंत में उन्हें घोड़ा पाताल लोक में मिला जो एक ऋषि के समीप बँधा था। सगर के पुत्रों ने यह सोच कर कि ऋषि ही घोड़े के गायब होने की वजह हैं उन्होंने ऋषि का अपमान किया। तपस्या में लीन ऋषि ने हजारों वर्ष बाद अपनी आँखें खोली और उनके क्रोध से सगर के सभी साठ हजार पुत्र जल कर वहीं भस्म हो गये। सगर के पुत्रों की आत्माएँ भूत बनकर विचरने लगीं क्योंकि उनका अंतिम संस्कार नहीं किया गया था। सगर के पुत्र अंशुमान ने आत्माओं की मुक्ति का असफल प्रयास किया और बाद में अंशुमान के पुत्र दिलीप ने भी। भगीरथ राजा दिलीप की दूसरी पत्नी के पुत्र थे। उन्होंने अपने पूर्वजों का अंतिम संस्कार किया। उन्होंने गंगा को पृथ्वी पर लाने का प्रण किया जिससे उनके अंतिम संस्कार कर, राख को गंगाजल में प्रवाहित किया जा सके और भटकती आत्माएँं स्वर्ग में जा सकें। भगीरथ ने ब्रह्म की घोर तपस्या की ताकि गंगा को पृथ्वी पर लाया जा सके। ब्रह्म प्रसन्न हुये और गंगा को पृथ्वी पर भेजने के लिये तैयार हुये और गंगा को पृथ्वी पर और उसके बाद पाताल में जाने का आदेश दिया ताकि सगर के पुत्रों की आत्माओं की मुक्ति संभव हो सके। तब गंगा ने कहा कि मैं इतनी ऊँचाई से जब पृथ्वी पर गिरूँगी, तो पृथ्वी इतना वेग कैसे सह पाएगी? तब भगीरथ ने भगवान शिव से निवेदन किया और उन्होंने अपनी खुली जटाओं में गंगा के वेग को रोक कर, एक लट खोल दी, जिससे गंगा की अविरल धारा पृथ्वी पर प्रवाहित हुई। वह धारा भगीरथ के पीछे-पीछे गंगा सागर संगम तक गई, जहाँ सगर-पुत्रों का उद्धार हुआ। शिव के स्पर्श से गंगा और भी पावन हो गयी और पृथ्वीवासियों के लिये बहुत ही श्रद्धा का केन्द्र बन गयीं। पुराणों के अनुसार स्वर्ग में गंगा को मन्दाकिनी और पाताल में भागीरथी कहते हैं। इसी प्रकार महाभारत में राजा शांतनु और गंगा के विवाह तथा उनके सात पुत्रों के जन्म की कहानी है।
गंगा के अवतरण का सच जो भी हो, पर यह एक तथ्य है कि यह भारत और बांग्लादेश में मिलाकर 2510 किमी की दूरी तय करती हुई उत्तरांचल में हिमालय से लेकर बंगाल की खाड़ी के सुंदरवन तक विशाल भू-भाग को सींचती है। गंगा अपनी सहायक नदियों के साथ देश के बड़े भू-भाग के लिए सिंचाई का बारहमासों स्त्रोत है। इन क्षेत्रों में प्रमुख रूप से धान, गेहूॅं, गन्ना, दलहन, तिलहन और आलू की पैदावार होती है। नदी की वजह से मछली उद्योग भी काफी फल-फूल रहा है। देश की प्राकृतिक संपदा ही नहीं, जन-जन की भावनात्मक आस्था का आधार भी गंगा है। 2510 किमी तक भारत तथा उसके बाद बांग्लादेश में अपनी लंबी यात्रा करते हुए यह सहायक नदियों के साथ दस लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल के अति विशाल उपजाऊ मैदान की रचना करती है।

गंगा पर्यटकों को भी आकर्षित करती है। गंगा नदी 5 राज्यांे उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल से होकर गुजरती है। इसके किनारे बसे प्रमुख शहर हैं-हरिद्वार, कन्नौज, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, पटना, फरख्खा इत्यादि। गंगा तट पर बसे 29 शहरों की जनसंख्या 1 लाख से अधिक है तो 23 शहरों की जनसंख्या 1 लाख से 50 हजार के बीच है। 48 शहरों की जनसंख्या 50 हजार से कम है।उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहाँ गंगा करीब एक हजार किलोमीटर का सफर तय करती है। यह दुनिया की ऐसी अकेली नदी है जिसके किनारे सबसे ज्यादा मिलियन सिटी (10 लाख या उससे ज्यादा आबादी वाले शहर) है। गंगा बेसिन में करीब 4 करोड़ की आबादी बसती है। ऐसे में सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण गंगा का यह मैदान अपनी घनी जनसंख्या के कारण भी जाना जाता है। 100 फीट (31 मी) की अधिकतम गहराई वाली यह नदी भारत में पवित्र मानी जाती है तथा इसकी उपासना माँ और देवी के रूप में की जाती है। गंगा नदी में मछलियों तथा सर्पों की अनेक प्रजातियाँ तो पाई ही जाती हैं मीठे पानी वाले दुर्लभ डाल्फिन भी पाए जाते हैं। यह कृषि, पर्यटन, साहसिक खेलों तथा उद्योगों के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है तथा अपने तट पर बसे शहरों की जलापूर्ति भी करती है। गंगा की इस असीमित शुद्धीकरण क्षमता और सामाजिक श्रद्धा के बावजूद इसका प्रदूषण रोका नहीं जा सका है। फिर भी इसके प्रयत्न जारी हैं और सफाई की अनेक परियोजनाओं के क्रम में नवंबर, 2008 में भारत सरकार द्वारा इसे भारत की राष्ट्रीय नदी तथा इलाहाबाद और हल्दिया के बीच (1600 किलोमीटर) गंगा नदी जलमार्ग- को राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया है।
यही कारण है कि यह हिंदी साहित्य की मानवीय चेतना को भी प्रवाहित करती है। ऋग्वेद, महाभारत, रामायण एवं अनेक पुराणों में गंगा को पुण्य सलिला, पाप-नाशिनी, मोक्ष प्रदायिनी, सरित्श्रेष्ठा एवं महानदी कहा गया है। संस्कृत कवि जगन्नाथ राय ने गंगा की स्तुति में श्रीगंगालहरी नामक काव्य की रचना की है। हिन्दी के आदि महाकाव्य पृथ्वीराज रासो, तथा वीसलदेव रास (नरपति नाल्ह) में गंगा का उल्लेख है। आदिकाल का सर्वाधिक लोक विश्रुत ग्रंथ जगनिक रचित आल्हखण्ड, में गंगा, यमुना और सरस्वती का उल्लेख है। कवि ने प्रयागराज की इस त्रिवेणी को पापनाशक बतलाया है। श्रृंगारी कवि विद्यापति, कबीर वाणी और जायसी के पद्मावत में भी गंगा का उल्लेख है, सूरदास और तुलसीदास ने भक्ति भावना से गंगा-माहात्म्य का वर्णन विस्तार से किया है। गोस्वामी तुलसीदास ने कवितावली के उत्तरकाण्ड में ‘श्री गंगा माहात्म्य’ का वर्णन तीन छन्दों में किया है-इन छन्दों में कवि ने गंगा दर्शन, गंगा स्नान, गंगा जल सेवन, गंगा तट पर बसने वालों के महत्त्व को वर्णित किया है। रीतिकाल में सेनापति और पद्माकर का गंगा वर्णन श्लाघनीय है। पद्माकर ने गंगा की महिमा और कीर्ति का वर्णन करने के लिए ’गंगालहरी’ नामक ग्रंथ की रचना की है। सेनापति ’कवित्त रत्नाकर’ में गंगा माहात्म्य का वर्णन करते हुए कहते हैं कि पाप की नाव को नष्ट करने के लिए गंगा की पुण्यधारा तलवार सी सुशोभित है। रसखान, रहीम आदि ने भी गंगा प्रभाव का सुन्दर वर्णन किया है। आधुनिक काल के कवियों में जगन्नाथदास रत्नाकर के ग्रंथ गंगावतरण में कपिल मुनि द्वारा शापित सगर के साठ हजार पुत्रों के उद्धार के लिए भगीरथ की भगीरथ-तपस्या से गंगा के भूमि पर अवतरित होने की कथा है। सम्पूर्ण ग्रंथ तेरह सर्गों में विभक्त और सोलह छन्द में निबद्ध है। अन्य कवियों में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, सुमित्रानन्दन पन्त और श्रीधर पाठक आदि ने भी यत्र-तत्र गंगा का वर्णन किया है। छायावादी कवियों का प्रकृति वर्णन हिन्दी साहित्य में उल्लेखनीय है। सुमित्रानन्दन पन्त ने ‘नौका विहार’ में ग्रीष्मकालीन तापस बाला गंगा का जो चित्र उकेरा है, वह अति रमणीय है। उन्होंने गंगा नामक कविता भी लिखी है। गंगा नदी के कई प्रतीकात्मक अर्थों का वर्णन जवाहर लाल नेहरू ने अपनी पुस्तक भारत एक खोज (डिस्कवरी ऑफ इंडिया) में किया है। भारतीय पुराण और साहित्य में अपने सौंदर्य और महत्व के कारण बार-बार आदर के साथ वंदित गंगा नदी के प्रति विदेशी साहित्य में भी प्रशंसा और भावुकतापूर्ण वर्णन किए गए हैं।
भारत की अनेक धार्मिक अवधारणाओं में गंगा नदी को देवी के रूप में निरुपित किया गया है। बहुत से पवित्र तीर्थस्थल गंगा नदी के किनारे पर बसे हुये हैं जिनमें वाराणसी और हरिद्वार सबसे प्रमुख हैं। गंगा नदी को भारत की पवित्र नदियों में सबसे पवित्र माना जाता है एवं यह मान्यता है कि गंगा में स्नान करने से मनुष्य के सारे पापों का नाश हो जाता है। मृत्यु के बाद लोग गंगा में अपनी राख विसर्जित करना मोक्ष प्राप्ति के लिये आवश्यक समझते हैं, यहाँ तक कि कुछ लोग गंगा के किनारे ही प्राण विसर्जन या अंतिम संस्कार की इच्छा भी रखते हैं। इसके घाटों पर लोग पूजा अर्चना करते हैं और ध्यान लगाते हैं। गंगाजल को पवित्र समझा जाता है तथा समस्त संस्कारों में उसका होना आवश्यक है। पंचामृत में भी गंगाजल को एक अमृत माना गया है। अनेक पर्वों और उत्सवों का गंगा से सीधा संबंध है। उदाहरण के लिए मकर संक्रांति, कुंभ और गंगा दशहरा के समय गंगा में नहाना या केवल दर्शन ही कर लेना बहुत महत्त्वपूर्ण समझा जाता है। इसके तटों पर अनेक प्रसिद्ध मेलों का आयोजन किया जाता है और अनेक प्रसिद्ध मंदिर गंगा के तट पर ही बने हुए हैं। महाभारत के अनुसार मात्र प्रयाग में माघ मास में गंगा-यमुना के संगम पर तीन करोड़ दस हजार तीर्थों का संगम होता है। ये तीर्थ स्थल सम्पूर्ण भारत में सांस्कृतिक एकता स्थापित करते हैं। गंगा को लक्ष्य करके अनेक भक्ति ग्रंथ लिखे गए हैं। जिनमें श्रीगंगासहस्रनामस्तोत्र और आरती सबसे लोकप्रिय हैं। अनेक लोग अपने दैनिक जीवन में श्रद्धा के साथ इनका प्रयोग करते हैं। गंगोत्री तथा अन्य स्थानों पर गंगा के मंदिर और मूर्तियाँ भी स्थापित हैं जिनके दर्शन कर श्रद्धालु स्वयं को कृतार्थ समझते हैं। उत्तराखंड के पंच प्रयाग तथा प्रयागराज जो इलाहाबाद में स्थित है, गंगा के वे प्रसिद्ध संगम स्थल हैं जहाँ वह अन्य नदियों से मिलती हैं। ये सभी संगम धार्मिक दृष्टि से पूज्य माने गए हैं।
गंगा भारत की संस्कृति, धर्म और पर्यावरण का सबसे बड़ा प्रतीक भी है। हिंदू गंगा में स्नान करने और गंगा जल के आचन को मोक्ष से जोड़ते है। गंगा जल का इस्तेमाल हिन्दुओं के बहुत सारे पवित्र कार्यो में किया जाता है। कई शोधों से यह बात साबित हो चुकी है कि गंगा के जल में बीमारी पैदा करने वाले जीवाणुओं को मारने की क्षमता रखता है। गंगा जल में यह शक्ति गंगोत्री और हिमालय से आती है। जब गंगा हिमालय से नीचे उतरती है तो इसमें कई तरह की मिट्टी कई तरह के खनिज, कई तरह की जड़ी बूटियाँं मिल जाती है। लंबे समय से प्रचलित इसकी शुद्धीकरण की मान्यता का वैज्ञानिक आधार भी है। वैज्ञानिक मानते हैं कि इस नदी के जल में बैक्टीरियोफेज नामक विषाणु होते हैं, जो जीवाणुओं व अन्य हानिकारक सूक्ष्मजीवों को जीवित नहीं रहने देते हैं। नदी के जल में प्राणवायु (ऑक्सीजन) की मात्रा को बनाए रखने की असाधारण क्षमता है। किंतु इसका कारण अभी तक अज्ञात है। इसके कारण हैजा और पेचिश जैसी बीमारियाँ होने का खतरा बहुत ही कम हो जाता है, जिससे महामारियाँ होने की संभावना बड़े स्तर पर टल जाती है। लेकिन गंगा के तट पर घने बसे औद्योगिक नगरों के नालों की गंदगी सीधे गंगा नदी में मिलने से गंगा का प्रदूषण पिछले कई सालों से भारत सरकार और जनता की चिंता का विषय बना हुआ है। औद्योगिक कचरे के साथ-साथ प्लास्टिक कचरे की बहुतायत ने गंगा जल को भी बेहद प्रदूषित किया है। वैज्ञानिक जांच के अनुसार गंगा का बायोलाजिकल ऑक्सीजन स्तर 3 डिग्री (सामान्य) से बढ़कर 6 डिग्री हो चुका है। गंगा में 2 करोड़ 90 लाख लीटर प्रदूषित कचरा प्रतिदिन गिर रहा है। विश्व बैंक रिपोर्ट के अनुसार उत्तर-प्रदेश की 12 प्रतिशत बीमारियों की वजह प्रदूषित गंगा जल है। यह घोर चिन्तनीय है कि गंगा-जल न स्नान के योग्य रहा, न पीने के योग्य रहा और न ही सिंचाई के योग्य। इसके अलावा घटता जल प्रवाह, घटती जल संग्रहण क्षमता और पानी का घटता स्तर आज चिंता का विषय बने हुए हैं। हरिद्वार के बाद जो गंगा आप देखते है उसमें मूल गंगा जल नहीं रह जाता। हरिद्वार के पास भीमगौड़ा से और उसके बाद नरौरा में गंगा का जल निकाल लिया जाता है। उसके आगे जो गंगा रह जाती है उसमें उसकी सहायक नदियों, नालों का पानी और भूजल ही रह जाता है। अलकनंदा और भागीरथी नामक जो दो नदियाँ देवप्रयाग आकर जीवनदायिनी गंगा बनती हैं। उसी देवनदी की हत्या केवल डेढ़ सौ किलोमीटर आगे हरिद्वार में मानव कर देता है।
गंगा की पवित्रता और अच्छाइयां ही उसकी दुश्मन बन गई हैं। गंगा के बेसिन में बसे 40 करोड़ से अधिक लोगों के जीवन पर उसका असर पड़ता है। इसके अलावा यह मीठे पानी डॉल्फिन सहित 140 से ज्यादा मछलियों का घर भी है। 10 करोड़ से अधिक लोग पीने और सिंचाई के पानी के लिए पूरी तरह से गंगा और इसकी सहायक नदियों पर निर्भर है। लोगों की नासमझी और गैर जिम्मेदाराना रवैये की वजह से जीवनदायिनी कुछ क्षेत्रों में ‘जीवन लेने‘ वाली बन गई है। नदी में लगातार बढ़ते प्रदूषण की वजह से कुछ स्थानों पर तो इसका जल आचमन करने लायक भी नही बचा है। यह नदी धार्मिक अनुष्ठानों के अपशिष्ट, औद्योगिक कचरे और शहरों से निकलने वाले सैकड़ों नालों से निकलने वाली गंदगी ने दुनिया की सबसे पवित्र नदी की यह हालत की है। एक अनुमान के मुताबिक हर रोज गंगा में 2 अरब लीटर गंदगी प्रवाहित कर दी जाती है। गंगा के किनारे बसे छोटे-बड़े करीब 100 शहरों के नालों का पानी बिना ट्रीटमेंट के गंगा में डाल दिया जाता है। 80 फीसदी कचरा गंगा नदी का सीधे नगर निगमों की नालियों के जरिये आता है, जबकि इस नदी में फेके गए कुल कचरे का करीब 15 फीसदी औद्योगिक स्त्रोतों से आता है। 12 से 13 अरब लीटर जल-मल हर दिन गंगा में डाला जाता है, इसके किनारे बसे 29 से अधिक शहरों, 70 कस्बों और हजारों गांवों का। 80 फीसदी स्वास्थ्य समस्याएं और करीब एक तिहाई मौते भारत में जलजनित बीमारियों के कारण होती हैं। जल प्रदूषण के कारण हैजा, टाइफाइड, हैपेटाइटिस, पीलिया और अमीबीय पेचिश जैसी बीमारियों में प्रदूषित पानी की अहम भूमिका रहती है। इस वजह से देश की इस सबसे बड़ी नदी का पानी पीना तो दूर स्नान करने लायक भी नही बचा है।
वस्तुतः गंगा के पराभव का अर्थ होगा, हमारी समूची सभ्यता का अंत। गंगा में बढ़ते प्रदूषण पर नियंत्रण पाने के लिए घड़ियालों की मदद ली जा रही है। शहरों की गंदगी को साफ करने के लिए संयंत्रों को लगाया जा रहा है और उद्योगों के कचरों को इसमें गिरने से रोकने के लिए कानून बने हैं। यूपीए सरकार ने गंगा को 2009 में राष्ट्रीय नदी तो घोषित कर दिया, पर गंगा अविरल रहने पर ही निर्मल होगी। गंगा एक्शन प्लान व राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना भी लागू की गई हैं। हालांकि इसकी सफलता पर प्रश्नचिह्न भी लगाए जाते रहे हैं। जनता भी इस विषय में जागृत हुई है। इसके साथ ही धार्मिक भावनाएँ आहत न हों इसके भी प्रयत्न किए जा रहे हैं। इतना सबकुछ होने के बावजूद गंगा के अस्तित्व पर संकट के बादल छाए हुए हैं। 2007 की एक संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट के अनुसार हिमालय पर स्थित गंगा की जलापूर्ति करने वाले हिमनद की 2030 तक समाप्त होने की संभावना है। इसके बाद नदी का बहाव मानसून पर आश्रित होकर मौसमी ही रह जाएगा।

संप्रग सरकार ने गंगा, यमुना, गोदावरी सहित विभिन्न नदियों के संरक्षण पर दस साल मंे 2607 करोड़ रूपये खर्च किए। बावजूद इसके इन नदियों में आज भी प्रदूषण का स्तर चिंताजनक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गंगा सहित अन्य कई नदियों की सफाई को अपनी सरकार की प्राथमिकताओं में रखा है। इसके तहत अलग मंत्रालय का गठन भी किया गया है। मंत्रालय ने गंगा को अविरल और निर्मल बनाने के लिए सचिवों की समिति बनाकर इसका खाका तैयार करना शुरु कर दिया है। हालांकि पिछली सरकार भी गंगा सहित देश की अन्य नदियों की सफाई पर काम करती रही है। गंगा को लेकर तमाम कवायदें चल रही हैं, पर यह बेहद जरूरी है कि गंगा सफाई अभियान पर हो रहे खर्च की मॉनीटिरंग हो और जबावदेही तय हो। मॉनीटिरिंग समिति में तकनीकी विशेषज्ञ रखे जाएं तो बेहतर होगा। आज सिर्फ प्रदूषण नियंत्रण पर फोकस करने के बजाय गंगा की समस्या को समग्र रूप में देखे जाने की जरूरत है। गंगा की अविरल धारा में आई रूकावट भी इसकी मौजूदा स्थिति के लिए उत्तरदायी है। इस नदी पर बने बिजली उत्पादन केंद्र और बांध इसकी धारा को रोकते है। इसका सीधा-सीधा असर नदी के जलीय जीवन पर पड़ता है। गंगा में बड़े बांँधों के निर्माण पर रोक लगाने के साथ-साथ पावर प्लांट के लिए छोटे बाँंध मुख्य स्त्रोत के बगल में बनाया जाएं। भूजल-स्तर संरक्षण की व्यवस्था, वर्षा जल संरक्षण का कड़ाई से पालन एवं वैकल्पिक बिजली उत्पादन को अपनाकर भी गंगा व अन्य नदियों का प्रवाह बढ़ाया जा सकता है।
गंगा मात्र एक नदी नहीं, माँ है। यह हमारी संस्कृति और सभ्यता की अविरलधारा है, जो अनंतकाल से यहाँ के चिंतन और चेतना को उर्वरा शक्ति से भरती रही। बीच के काल खंड में उसके साथ हुई छेड़छाड़ के कारण ही मांँ गंगा का वह दिव्य प्रवाह अवरुद्ध हुआ।यदि कठिन परिश्रम और सही रणनीति के साथ गंगा को साफ करने का प्रयत्न किया जाए तो यह कार्य असंभव भी नहीं है। इस कार्य के लिए एक दीर्घकालिक रणनीति बनाने की जरूरत है। जन-सहभागिता को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इसके लिए व्यापक जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है। इस महान कार्य को भ्रष्टाचार से मुक्त करना भी एक कठिन चुनौती होगी, क्योंकि कई बार देखने में आया है कि ऐसे कार्य भ्रष्टाचार के शिकार होने के कारण बीच में ही बंद हो जाते है। यदि दीर्घकालिक रणनीति पर सही ढंग से कार्यान्वयन किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब गंगा फिर से अपने गौरव को प्राप्त करेगी और
करोड़ों लोगों के लिए वास्तव में मोक्षदायिनी बन जाएगी।

गंगा सिर्फ एक नदी का नाम नहीं है, बल्कि यह जीवनदायी है। गंगा की लहरों ने न जाने कितनी सभ्यताओं व संस्कृतियों को बनते बिगड़ते देखा। वैदिक काल से लेकर आधुनिक युग तक के उत्थान-पतन का गवाह है गंगा। राजनीति, अर्थनीति, सामाजिक व्यवस्था से लेकर धर्म, अध्यात्म, पर्यटन, पर्यावरण तक सब इससे प्रभावित होते रहे हैं। एक ही गंगा के न जाने कितने रूप हैं, हर कोई उसे अपने-अपने नजरिए से विश्लेषित करता है। इसके तट पर विकसित धार्मिक स्थल और तीर्थ भारतीय सामाजिक व्यवस्था के विशेष अंग हैं। इसके ऊपर बने पुल, बाँध और नदी परियोजनाएँ भारत की बिजली, पानी और कृषि से संबंधित जरूरतों को पूरा करती हैं। राष्ट्रीय नदी गंगा भारत की सबसे लंबी नदी है जो पर्वतों, घाटियों और मैदानों में 2,510 किलोमीटर की दूरी तय करती है। वैज्ञानिक मानते हैं कि इस नदी के जल में बैक्टीरियोफेज नामक विषाणु होते हैं, जो जीवाणुओं व अन्य हानिकारक सूक्ष्मजीवों को जीवित नहीं रहने देते हैं। तभी तो इसे माँ कहा गया है। इसकी गोद में न जाने कितनों का विकास हुआ, प्रभाव बढ़ा और आज भी गंगा तट के बाशिंदों को गर्व है कि वे माँ गंगा के सानिध्य में फलते-फूलते हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने गंगा को भुक्ति-मुक्ति दायिनी कहा है। गंगा जी के बारे में तुलसीदास की चौपाई हैः- दरश्, परस, मज्जन अरु पाना। हरहिं पाप, कह वेद पुराना।। अर्थात, गंगा जी के दर्शन, स्पर्श, स्नान और पान से सभी प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं। वैसे भी, गंगा को शास्त्रों में ब्रह्म द्रव कहा गया है। सीधे शब्दों में कहें तो गंगा हमारी जरूरतों को भी पूरा करती हैं और मुक्ति भी दिलाती है। यानी हमारी भुक्ति-मुक्ति दोनों का साधन बनती है। गंगा नदी हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। यह करोड़ों लोगों के लिए जीवन रेखा और आस्था का प्रतीक है। गंगा नदी के अवतरण को लेकर अनेक पौराणिक कथाएँ जुड़ी हुई हैं। मिथकों के अनुसार ब्रह्म ने विष्णु के पैर के पसीने की बूँदों से गंगा का निर्माण किया। त्रिमूर्ति के दो सदस्यों के स्पर्श के कारण इसे पवित्र समझा गया। एक अन्य कथा राजा भगीरथ से जुड़ी हुई है। इसके अनुसार राजा सगर ने जादुई रुप से साठ हजार पुत्रों की प्राप्ति की। एक दिन राजा सगर ने देवलोक पर विजय प्राप्त करने के लिये एक यज्ञ किया। यज्ञ के लिये घोड़ा आवश्यक था जो ईष्यालु इंद्र ने चुरा लिया था। सगर ने अपने सारे पुत्रों को घोड़े की खोज में भेज दिया। अंत में उन्हें घोड़ा पाताल लोक में मिला जो एक ऋषि के समीप बँधा था। सगर के पुत्रों ने यह सोच कर कि ऋषि ही घोड़े के गायब होने की वजह हैं उन्होंने ऋषि का अपमान किया। तपस्या में लीन ऋषि ने हजारों वर्ष बाद अपनी आँखें खोली और उनके क्रोध से सगर के सभी साठ हजार पुत्र जल कर वहीं भस्म हो गये। सगर के पुत्रों की आत्माएँ भूत बनकर विचरने लगीं क्योंकि उनका अंतिम संस्कार नहीं किया गया था। सगर के पुत्र अंशुमान ने आत्माओं की मुक्ति का असफल प्रयास किया और बाद में अंशुमान के पुत्र दिलीप ने भी। भगीरथ राजा दिलीप की दूसरी पत्नी के पुत्र थे। उन्होंने अपने पूर्वजों का अंतिम संस्कार किया। उन्होंने गंगा को पृथ्वी पर लाने का प्रण किया जिससे उनके अंतिम संस्कार कर, राख को गंगाजल में प्रवाहित किया जा सके और भटकती आत्माएँं स्वर्ग में जा सकें। भगीरथ ने ब्रह्म की घोर तपस्या की ताकि गंगा को पृथ्वी पर लाया जा सके। ब्रह्म प्रसन्न हुये और गंगा को पृथ्वी पर भेजने के लिये तैयार हुये और गंगा को पृथ्वी पर और उसके बाद पाताल में जाने का आदेश दिया ताकि सगर के पुत्रों की आत्माओं की मुक्ति संभव हो सके। तब गंगा ने कहा कि मैं इतनी ऊँचाई से जब पृथ्वी पर गिरूँगी, तो पृथ्वी इतना वेग कैसे सह पाएगी? तब भगीरथ ने भगवान शिव से निवेदन किया और उन्होंने अपनी खुली जटाओं में गंगा के वेग को रोक कर, एक लट खोल दी, जिससे गंगा की अविरल धारा पृथ्वी पर प्रवाहित हुई। वह धारा भगीरथ के पीछे-पीछे गंगा सागर संगम तक गई, जहाँ सगर-पुत्रों का उद्धार हुआ। शिव के स्पर्श से गंगा और भी पावन हो गयी और पृथ्वीवासियों के लिये बहुत ही श्रद्धा का केन्द्र बन गयीं। पुराणों के अनुसार स्वर्ग में गंगा को मन्दाकिनी और पाताल में भागीरथी कहते हैं। इसी प्रकार महाभारत में राजा शांतनु और गंगा के विवाह तथा उनके सात पुत्रों के जन्म की कहानी है। गंगा के अवतरण का सच जो भी हो, पर यह एक तथ्य है कि यह भारत और बांग्लादेश में मिलाकर 2510 किमी की दूरी तय करती हुई उत्तरांचल में हिमालय से लेकर बंगाल की खाड़ी के सुंदरवन तक विशाल भू-भाग को सींचती है। गंगा अपनी सहायक नदियों के साथ देश के बड़े भू-भाग के लिए सिंचाई का बारहमासों स्त्रोत है। इन क्षेत्रों में प्रमुख रूप से धान, गेहूॅं, गन्ना, दलहन, तिलहन और आलू की पैदावार होती है। नदी की वजह से मछली उद्योग भी काफी फल-फूल रहा है। देश की प्राकृतिक संपदा ही नहीं, जन-जन की भावनात्मक आस्था का आधार भी गंगा है। 2510 किमी तक भारत तथा उसके बाद बांग्लादेश में अपनी लंबी यात्रा करते हुए यह सहायक नदियों के साथ दस लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल के अति विशाल उपजाऊ मैदान की रचना करती है। गंगा पर्यटकों को भी आकर्षित करती है। गंगा नदी 5 राज्यांे उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल से होकर गुजरती है। इसके किनारे बसे प्रमुख शहर हैं-हरिद्वार, कन्नौज, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, पटना, फरख्खा इत्यादि। गंगा तट पर बसे 29 शहरों की जनसंख्या 1 लाख से अधिक है तो 23 शहरों की जनसंख्या 1 लाख से 50 हजार के बीच है। 48 शहरों की जनसंख्या 50 हजार से कम है।उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहाँ गंगा करीब एक हजार किलोमीटर का सफर तय करती है। यह दुनिया की ऐसी अकेली नदी है जिसके किनारे सबसे ज्यादा मिलियन सिटी (10 लाख या उससे ज्यादा आबादी वाले शहर) है। गंगा बेसिन में करीब 4 करोड़ की आबादी बसती है। ऐसे में सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण गंगा का यह मैदान अपनी घनी जनसंख्या के कारण भी जाना जाता है। 100 फीट (31 मी) की अधिकतम गहराई वाली यह नदी भारत में पवित्र मानी जाती है तथा इसकी उपासना माँ और देवी के रूप में की जाती है। गंगा नदी में मछलियों तथा सर्पों की अनेक प्रजातियाँ तो पाई ही जाती हैं मीठे पानी वाले दुर्लभ डाल्फिन भी पाए जाते हैं। यह कृषि, पर्यटन, साहसिक खेलों तथा उद्योगों के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है तथा अपने तट पर बसे शहरों की जलापूर्ति भी करती है। गंगा की इस असीमित शुद्धीकरण क्षमता और सामाजिक श्रद्धा के बावजूद इसका प्रदूषण रोका नहीं जा सका है। फिर भी इसके प्रयत्न जारी हैं और सफाई की अनेक परियोजनाओं के क्रम में नवंबर, 2008 में भारत सरकार द्वारा इसे भारत की राष्ट्रीय नदी तथा इलाहाबाद और हल्दिया के बीच (1600 किलोमीटर) गंगा नदी जलमार्ग- को राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया है। यही कारण है कि यह हिंदी साहित्य की मानवीय चेतना को भी प्रवाहित करती है। ऋग्वेद, महाभारत, रामायण एवं अनेक पुराणों में गंगा को पुण्य सलिला, पाप-नाशिनी, मोक्ष प्रदायिनी, सरित्श्रेष्ठा एवं महानदी कहा गया है। संस्कृत कवि जगन्नाथ राय ने गंगा की स्तुति में श्रीगंगालहरी नामक काव्य की रचना की है। हिन्दी के आदि महाकाव्य पृथ्वीराज रासो, तथा वीसलदेव रास (नरपति नाल्ह) में गंगा का उल्लेख है। आदिकाल का सर्वाधिक लोक विश्रुत ग्रंथ जगनिक रचित आल्हखण्ड, में गंगा, यमुना और सरस्वती का उल्लेख है। कवि ने प्रयागराज की इस त्रिवेणी को पापनाशक बतलाया है। श्रृंगारी कवि विद्यापति, कबीर वाणी और जायसी के पद्मावत में भी गंगा का उल्लेख है, सूरदास और तुलसीदास ने भक्ति भावना से गंगा-माहात्म्य का वर्णन विस्तार से किया है। गोस्वामी तुलसीदास ने कवितावली के उत्तरकाण्ड में ‘श्री गंगा माहात्म्य’ का वर्णन तीन छन्दों में किया है-इन छन्दों में कवि ने गंगा दर्शन, गंगा स्नान, गंगा जल सेवन, गंगा तट पर बसने वालों के महत्त्व को वर्णित किया है। रीतिकाल में सेनापति और पद्माकर का गंगा वर्णन श्लाघनीय है। पद्माकर ने गंगा की महिमा और कीर्ति का वर्णन करने के लिए ’गंगालहरी’ नामक ग्रंथ की रचना की है। सेनापति ’कवित्त रत्नाकर’ में गंगा माहात्म्य का वर्णन करते हुए कहते हैं कि पाप की नाव को नष्ट करने के लिए गंगा की पुण्यधारा तलवार सी सुशोभित है। रसखान, रहीम आदि ने भी गंगा प्रभाव का सुन्दर वर्णन किया है। आधुनिक काल के कवियों में जगन्नाथदास रत्नाकर के ग्रंथ गंगावतरण में कपिल मुनि द्वारा शापित सगर के साठ हजार पुत्रों के उद्धार के लिए भगीरथ की भगीरथ-तपस्या से गंगा के भूमि पर अवतरित होने की कथा है। सम्पूर्ण ग्रंथ तेरह सर्गों में विभक्त और सोलह छन्द में निबद्ध है। अन्य कवियों में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, सुमित्रानन्दन पन्त और श्रीधर पाठक आदि ने भी यत्र-तत्र गंगा का वर्णन किया है। छायावादी कवियों का प्रकृति वर्णन हिन्दी साहित्य में उल्लेखनीय है। सुमित्रानन्दन पन्त ने ‘नौका विहार’ में ग्रीष्मकालीन तापस बाला गंगा का जो चित्र उकेरा है, वह अति रमणीय है। उन्होंने गंगा नामक कविता भी लिखी है। गंगा नदी के कई प्रतीकात्मक अर्थों का वर्णन जवाहर लाल नेहरू ने अपनी पुस्तक भारत एक खोज (डिस्कवरी ऑफ इंडिया) में किया है। भारतीय पुराण और साहित्य में अपने सौंदर्य और महत्व के कारण बार-बार आदर के साथ वंदित गंगा नदी के प्रति विदेशी साहित्य में भी प्रशंसा और भावुकतापूर्ण वर्णन किए गए हैं। भारत की अनेक धार्मिक अवधारणाओं में गंगा नदी को देवी के रूप में निरुपित किया गया है। बहुत से पवित्र तीर्थस्थल गंगा नदी के किनारे पर बसे हुये हैं जिनमें वाराणसी और हरिद्वार सबसे प्रमुख हैं। गंगा नदी को भारत की पवित्र नदियों में सबसे पवित्र माना जाता है एवं यह मान्यता है कि गंगा में स्नान करने से मनुष्य के सारे पापों का नाश हो जाता है। मृत्यु के बाद लोग गंगा में अपनी राख विसर्जित करना मोक्ष प्राप्ति के लिये आवश्यक समझते हैं, यहाँ तक कि कुछ लोग गंगा के किनारे ही प्राण विसर्जन या अंतिम संस्कार की इच्छा भी रखते हैं। इसके घाटों पर लोग पूजा अर्चना करते हैं और ध्यान लगाते हैं। गंगाजल को पवित्र समझा जाता है तथा समस्त संस्कारों में उसका होना आवश्यक है। पंचामृत में भी गंगाजल को एक अमृत माना गया है। अनेक पर्वों और उत्सवों का गंगा से सीधा संबंध है। उदाहरण के लिए मकर संक्रांति, कुंभ और गंगा दशहरा के समय गंगा में नहाना या केवल दर्शन ही कर लेना बहुत महत्त्वपूर्ण समझा जाता है। इसके तटों पर अनेक प्रसिद्ध मेलों का आयोजन किया जाता है और अनेक प्रसिद्ध मंदिर गंगा के तट पर ही बने हुए हैं। महाभारत के अनुसार मात्र प्रयाग में माघ मास में गंगा-यमुना के संगम पर तीन करोड़ दस हजार तीर्थों का संगम होता है। ये तीर्थ स्थल सम्पूर्ण भारत में सांस्कृतिक एकता स्थापित करते हैं। गंगा को लक्ष्य करके अनेक भक्ति ग्रंथ लिखे गए हैं। जिनमें श्रीगंगासहस्रनामस्तोत्र और आरती सबसे लोकप्रिय हैं। अनेक लोग अपने दैनिक जीवन में श्रद्धा के साथ इनका प्रयोग करते हैं। गंगोत्री तथा अन्य स्थानों पर गंगा के मंदिर और मूर्तियाँ भी स्थापित हैं जिनके दर्शन कर श्रद्धालु स्वयं को कृतार्थ समझते हैं। उत्तराखंड के पंच प्रयाग तथा प्रयागराज जो इलाहाबाद में स्थित है, गंगा के वे प्रसिद्ध संगम स्थल हैं जहाँ वह अन्य नदियों से मिलती हैं। ये सभी संगम धार्मिक दृष्टि से पूज्य माने गए हैं। गंगा भारत की संस्कृति, धर्म और पर्यावरण का सबसे बड़ा प्रतीक भी है। हिंदू गंगा में स्नान करने और गंगा जल के आचन को मोक्ष से जोड़ते है। गंगा जल का इस्तेमाल हिन्दुओं के बहुत सारे पवित्र कार्यो में किया जाता है। कई शोधों से यह बात साबित हो चुकी है कि गंगा के जल में बीमारी पैदा करने वाले जीवाणुओं को मारने की क्षमता रखता है। गंगा जल में यह शक्ति गंगोत्री और हिमालय से आती है। जब गंगा हिमालय से नीचे उतरती है तो इसमें कई तरह की मिट्टी कई तरह के खनिज, कई तरह की जड़ी बूटियाँं मिल जाती है। लंबे समय से प्रचलित इसकी शुद्धीकरण की मान्यता का वैज्ञानिक आधार भी है। वैज्ञानिक मानते हैं कि इस नदी के जल में बैक्टीरियोफेज नामक विषाणु होते हैं, जो जीवाणुओं व अन्य हानिकारक सूक्ष्मजीवों को जीवित नहीं रहने देते हैं। नदी के जल में प्राणवायु (ऑक्सीजन) की मात्रा को बनाए रखने की असाधारण क्षमता है। किंतु इसका कारण अभी तक अज्ञात है। इसके कारण हैजा और पेचिश जैसी बीमारियाँ होने का खतरा बहुत ही कम हो जाता है, जिससे महामारियाँ होने की संभावना बड़े स्तर पर टल जाती है। लेकिन गंगा के तट पर घने बसे औद्योगिक नगरों के नालों की गंदगी सीधे गंगा नदी में मिलने से गंगा का प्रदूषण पिछले कई सालों से भारत सरकार और जनता की चिंता का विषय बना हुआ है। औद्योगिक कचरे के साथ-साथ प्लास्टिक कचरे की बहुतायत ने गंगा जल को भी बेहद प्रदूषित किया है। वैज्ञानिक जांच के अनुसार गंगा का बायोलाजिकल ऑक्सीजन स्तर 3 डिग्री (सामान्य) से बढ़कर 6 डिग्री हो चुका है। गंगा में 2 करोड़ 90 लाख लीटर प्रदूषित कचरा प्रतिदिन गिर रहा है। विश्व बैंक रिपोर्ट के अनुसार उत्तर-प्रदेश की 12 प्रतिशत बीमारियों की वजह प्रदूषित गंगा जल है। यह घोर चिन्तनीय है कि गंगा-जल न स्नान के योग्य रहा, न पीने के योग्य रहा और न ही सिंचाई के योग्य। इसके अलावा घटता जल प्रवाह, घटती जल संग्रहण क्षमता और पानी का घटता स्तर आज चिंता का विषय बने हुए हैं। हरिद्वार के बाद जो गंगा आप देखते है उसमें मूल गंगा जल नहीं रह जाता। हरिद्वार के पास भीमगौड़ा से और उसके बाद नरौरा में गंगा का जल निकाल लिया जाता है। उसके आगे जो गंगा रह जाती है उसमें उसकी सहायक नदियों, नालों का पानी और भूजल ही रह जाता है। अलकनंदा और भागीरथी नामक जो दो नदियाँ देवप्रयाग आकर जीवनदायिनी गंगा बनती हैं। उसी देवनदी की हत्या केवल डेढ़ सौ किलोमीटर आगे हरिद्वार में मानव कर देता है। गंगा की पवित्रता और अच्छाइयां ही उसकी दुश्मन बन गई हैं। गंगा के बेसिन में बसे 40 करोड़ से अधिक लोगों के जीवन पर उसका असर पड़ता है। इसके अलावा यह मीठे पानी डॉल्फिन सहित 140 से ज्यादा मछलियों का घर भी है। 10 करोड़ से अधिक लोग पीने और सिंचाई के पानी के लिए पूरी तरह से गंगा और इसकी सहायक नदियों पर निर्भर है। लोगों की नासमझी और गैर जिम्मेदाराना रवैये की वजह से जीवनदायिनी कुछ क्षेत्रों में ‘जीवन लेने‘ वाली बन गई है। नदी में लगातार बढ़ते प्रदूषण की वजह से कुछ स्थानों पर तो इसका जल आचमन करने लायक भी नही बचा है। यह नदी धार्मिक अनुष्ठानों के अपशिष्ट, औद्योगिक कचरे और शहरों से निकलने वाले सैकड़ों नालों से निकलने वाली गंदगी ने दुनिया की सबसे पवित्र नदी की यह हालत की है। एक अनुमान के मुताबिक हर रोज गंगा में 2 अरब लीटर गंदगी प्रवाहित कर दी जाती है। गंगा के किनारे बसे छोटे-बड़े करीब 100 शहरों के नालों का पानी बिना ट्रीटमेंट के गंगा में डाल दिया जाता है। 80 फीसदी कचरा गंगा नदी का सीधे नगर निगमों की नालियों के जरिये आता है, जबकि इस नदी में फेके गए कुल कचरे का करीब 15 फीसदी औद्योगिक स्त्रोतों से आता है। 12 से 13 अरब लीटर जल-मल हर दिन गंगा में डाला जाता है, इसके किनारे बसे 29 से अधिक शहरों, 70 कस्बों और हजारों गांवों का। 80 फीसदी स्वास्थ्य समस्याएं और करीब एक तिहाई मौते भारत में जलजनित बीमारियों के कारण होती हैं। जल प्रदूषण के कारण हैजा, टाइफाइड, हैपेटाइटिस, पीलिया और अमीबीय पेचिश जैसी बीमारियों में प्रदूषित पानी की अहम भूमिका रहती है। इस वजह से देश की इस सबसे बड़ी नदी का पानी पीना तो दूर स्नान करने लायक भी नही बचा है। वस्तुतः गंगा के पराभव का अर्थ होगा, हमारी समूची सभ्यता का अंत। गंगा में बढ़ते प्रदूषण पर नियंत्रण पाने के लिए घड़ियालों की मदद ली जा रही है। शहरों की गंदगी को साफ करने के लिए संयंत्रों को लगाया जा रहा है और उद्योगों के कचरों को इसमें गिरने से रोकने के लिए कानून बने हैं। यूपीए सरकार ने गंगा को 2009 में राष्ट्रीय नदी तो घोषित कर दिया, पर गंगा अविरल रहने पर ही निर्मल होगी। गंगा एक्शन प्लान व राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना भी लागू की गई हैं। हालांकि इसकी सफलता पर प्रश्नचिह्न भी लगाए जाते रहे हैं। जनता भी इस विषय में जागृत हुई है। इसके साथ ही धार्मिक भावनाएँ आहत न हों इसके भी प्रयत्न किए जा रहे हैं। इतना सबकुछ होने के बावजूद गंगा के अस्तित्व पर संकट के बादल छाए हुए हैं। 2007 की एक संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट के अनुसार हिमालय पर स्थित गंगा की जलापूर्ति करने वाले हिमनद की 2030 तक समाप्त होने की संभावना है। इसके बाद नदी का बहाव मानसून पर आश्रित होकर मौसमी ही रह जाएगा। संप्रग सरकार ने गंगा, यमुना, गोदावरी सहित विभिन्न नदियों के संरक्षण पर दस साल मंे 2607 करोड़ रूपये खर्च किए। बावजूद इसके इन नदियों में आज भी प्रदूषण का स्तर चिंताजनक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गंगा सहित अन्य कई नदियों की सफाई को अपनी सरकार की प्राथमिकताओं में रखा है। इसके तहत अलग मंत्रालय का गठन भी किया गया है। मंत्रालय ने गंगा को अविरल और निर्मल बनाने के लिए सचिवों की समिति बनाकर इसका खाका तैयार करना शुरु कर दिया है। हालांकि पिछली सरकार भी गंगा सहित देश की अन्य नदियों की सफाई पर काम करती रही है। गंगा को लेकर तमाम कवायदें चल रही हैं, पर यह बेहद जरूरी है कि गंगा सफाई अभियान पर हो रहे खर्च की मॉनीटिरंग हो और जबावदेही तय हो। मॉनीटिरिंग समिति में तकनीकी विशेषज्ञ रखे जाएं तो बेहतर होगा। आज सिर्फ प्रदूषण नियंत्रण पर फोकस करने के बजाय गंगा की समस्या को समग्र रूप में देखे जाने की जरूरत है। गंगा की अविरल धारा में आई रूकावट भी इसकी मौजूदा स्थिति के लिए उत्तरदायी है। इस नदी पर बने बिजली उत्पादन केंद्र और बांध इसकी धारा को रोकते है। इसका सीधा-सीधा असर नदी के जलीय जीवन पर पड़ता है। गंगा में बड़े बांँधों के निर्माण पर रोक लगाने के साथ-साथ पावर प्लांट के लिए छोटे बाँंध मुख्य स्त्रोत के बगल में बनाया जाएं। भूजल-स्तर संरक्षण की व्यवस्था, वर्षा जल संरक्षण का कड़ाई से पालन एवं वैकल्पिक बिजली उत्पादन को अपनाकर भी गंगा व अन्य नदियों का प्रवाह बढ़ाया जा सकता है। गंगा मात्र एक नदी नहीं, माँ है। यह हमारी संस्कृति और सभ्यता की अविरलधारा है, जो अनंतकाल से यहाँ के चिंतन और चेतना को उर्वरा शक्ति से भरती रही। बीच के काल खंड में उसके साथ हुई छेड़छाड़ के कारण ही मांँ गंगा का वह दिव्य प्रवाह अवरुद्ध हुआ।यदि कठिन परिश्रम और सही रणनीति के साथ गंगा को साफ करने का प्रयत्न किया जाए तो यह कार्य असंभव भी नहीं है। इस कार्य के लिए एक दीर्घकालिक रणनीति बनाने की जरूरत है। जन-सहभागिता को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इसके लिए व्यापक जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है। इस महान कार्य को भ्रष्टाचार से मुक्त करना भी एक कठिन चुनौती होगी, क्योंकि कई बार देखने में आया है कि ऐसे कार्य भ्रष्टाचार के शिकार होने के कारण बीच में ही बंद हो जाते है। यदि दीर्घकालिक रणनीति पर सही ढंग से कार्यान्वयन किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब गंगा फिर से अपने गौरव को प्राप्त करेगी और करोड़ों लोगों के लिए वास्तव में मोक्षदायिनी बन जाएगी।

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